9 Varsh Kee Aurat

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फोन रिसीव करके जैसे ही मैंने कहा – ” हाइ बहन ! कैसी है ?” मेरी राज दुलारी दौड़कर आई और मेरे हाथों से फोन छीनकर अपनी मौसी से अनगिनत संवादों के प्रयास करने लगी। रानू मौसी ने भी क्रमशः शिकायतों , फरमाइशों और उपलब्धि के लंबे सिलसिले का सामना करने के लिए सहर्ष कमर कस ली थी।
” कितने दिनों में फोन लगाया ? मैं फोन लगाती हूँ तो रिप्लाय नहीं करते, जबकी मम्मू को तो कर देते हो”
“आपको पता है, मैं आपको कितना याद करती हूँ ! मैं नहीं जानती कुछ , अब आपको मुझसे मिलने आना ही होगा और मुझे वो जैली वाली कैंडी चाहिए ही चाहिए, और हाँ हमने साथ में जो लंबी चोटी वाली डॉल पसंद की थी ना मॉल में ! आते वक्त अपने साथ लाना मत भूल जाना।
अ-अ- और आखरी बात , मैंने जो भी कुछ माँगा, प्लीज़ मम्मू को मत बताना।”
”अरे सुनों आपको पता है मैंने आपके लिए बर्थडे -ग्रीटिंग बनाया है, और मम्मू ने खुद अपने लिए जो नया स्वेटर लाई है ना ! वो मैने छुपाकर २ख लिया है , आप ले जाना अपने साथ…. ब्ला-ब्ला-ब्ला..”
अब बारी थी रानू मासी की, इसलिए मुझे आवश्यकता थी एलर्ट रहने की , क्योंकि हमेशा की तरह अब वह मान्या की टॉग- खिंचाई और उसे दुविधा में डालने वाली बातें करने वाली थी၊ मुझे एलर्ट रहने की आवश्यकता इसीलिए नहीं कि वह जवाब देने में असमर्थ है, बल्कि इसिलिए है कि मैं चाहती हूँ कि वह कोई भी प्रत्योत्तर व वार्तालाप बस समय गुज़ार ने के लिये ना करे बल्कि तर्क – वितर्क और विश्लेषण पर आधारित एक रचनात्मक प्रतिक्रिया दे ၊

मेरा चौकन्ना २हना काम तो ना आया पर हाँ,सार्थक ज़रूर रहा और सार्थक भी इतना कि मैं यह लेख लिखने के लिये विवश हो गई…. ख़ैर ,मान्या तो बस मान्या है, सब जानते हैं कि उसकी बायोलॉजिकल उम्र भले ही सामान्य हो प२न्तु उसकी मानसिक व सामाजिक-सांस्कृतिक उम्र हम सबसे कई अधिक है, वह ९ वर्ष की एक प्रौढ़ बच्ची है और उसने यह साबित कर डाला जा व उसकी २ानू मासी ने उसे यूँ छेड़ा –
“और बताओ मान्या, इस बार क्रिसमस पर क्या कर रहे हो?”
“मम्मू प्लम – केक बना रही हैं, हम बच्चों के लिये। वर्ल्ड के लिये प्रेय करेंगे, केक और बाकी चीज़ें खाएंगे … और हाँ सब बच्चे मिलकर क्रिसमस – ट्री को सजाएंगे।”
“अरे वाह ! इस बार यह चमत्कार कैसे हुआ ? फिजूल खर्च ना करने वाली आपकी मम्मू इतना महंगा क्रिस्मस-ट्री कैसे खरीद लाईं !”
“खरीदा नहीं मासी! मम्मू ने बोला वेस्ट मटीरीयल से खुद बनाने को, तो ट्री भी हम बच्चों ने ही मिलकर बनाया ,अब उसी को खूब सजाएंगे।”

“अरे -रे – रे… मान्या ! यह तो बुरा हुआ, नकली पेड़ सजाने में क्या मज़ा ! मेरे पास तो असली पेड़ है. मैं तो उसे ही सजाकर असली क्रिसमस मनाऊँगी। उसमें फेवीकॉल लगाकर चमक चिपकाऊँगी, कील या ऑलपिन गड़ा कर उसमें बॉल्स लटकाऊँगी’ केमिकल – स्नो छिड़कूँगी…. ब्ला-ब्ला-ब्ला…”
“लेकिन मुझे एक बात समझाओं मासी ! इतने अच्छे त्यौहार पर एक असलीपेड़ को दुख देना सही है या एक नकली पेड़ को खुशी देना !”
रानू के लिये शायद यह निरुत्तर कर देने वाला जवाब होगा पर मेरे लिये मेरे कंधों से मेरी जिम्मेदारियों का कम होता वज़न ।
शिक्षा (सोनाली काशिव)