आज एक कविता पढ़ी | पढ़ते ही मन भावुक हो उठा |बेटियों को समर्पित यह कविता एक नई सोच की पहल है|मुझे यह तो नहीं पता कि यह कविता किसके द्वारा लिखी गई है परंतु जो भी इसके लेखक हैं शायद एक बेटी के पिता हैं | बेटी के विवाह को लेकर पिता के मन की भावनाएं इस कविता में बखूबी जाहिर की गई हैं जो मैं आज आप लोगों को बताना चाहती हूं |

“कन्यादान नहीं करूंगा जाओ ,
मैं नहीं मानता इसे ,
क्योंकि मेरी बेटी कोई चीज़ नहीं ,
जिसको दान में दे दूँ ,
मैं बांधता हूँ बेटी तुम्हें एक पवित्र बंधन में ,
पति के साथ मिलकर निभाना तुम ,
मैं तुम्हें अलविदा नहीं कह रहा ,
आज से तुम्हारे दो घर ,जब जी चाहे आना तुम ,
जहाँ जा रही हो ,खूब प्यार बरसाना तुम ,
सब को अपना बनाना तुम ,पर कभी भी
न मर मर के जीना , न जी जी के मरना तुम ,
तुम अन्नपूर्णा , शक्ति , रति सब तुम ,
ज़िंदगी को भरपूर जीना तुम ,
न तुम बेचारी , न अबला ,
खुद को असहाय कभी न समझना तुम ,
मैं दान नहीं कर रहा तुम्हें ,
प्यार के एक और बंधन में बाँध रहा हूँ ,
उसे बखूबी निभाना तुम…….. |”

*एक नयी सोच एक नयी पहल*