“Pradyumn” -Ek Saamaajik Samasya

समाज में जागरूकता का सूत्रपात पुन: हो रहा है,एक सकारात्मक परिवर्तन।

समाज “मैं” से निकाल कर “हम” को स्वीकार कर रहा है, और यही हमें आज नहीं तो कल ‘निर्भया’, ‘प्रधुम्न’ जैसे सामाजिक अपराधों से मुक्ति दिलाएगा, बस इतना प्रयास करना होगा की घटना होने के बाद की जागरूकता को घटना ही न हो इसमें बदलना होगा,सरल है संभव है बस थोड़ी सी जागरूकता अपने चारों और हो रही अच्छी बुरी घटना पर नज़र बनाए रखें अच्छे काम को सराहें और बुरे काम का विरोध व्यक्त करें।

मैं एक पुरानी अपने साथ घटी घटना बताता हूँ ………मैं तीसरी चौथी कक्षा में था, उस जमाने में चाबी के खिलौने का दौर शुरू हुआ था, दो ही खिलौने मिलते थे एक मुर्गा जो दाना चुगता था और एक गुड़िया जो शर्बत पीती थी मेरे मित्र श्री राकेश मालवीय के पिताजी शर्बत पीने वाली गुड़िया लाये, उसने हम 3-4 दोस्तों को चुपके से बताया और हम 10 मिनिट के अवकाश में दौड़ कर उसके घर चले गए कि देख के आते है, चाबी भरी और वो चलने लगी बड़ा मजा आया और स्कूल भूल गए फिर क्या था देर से पहुँचने पर शिक्षक ने कक्षा में प्रवेश नहीं दिया, और कहा कि पिताजी को लेकर आओ, अब तो घर भी मार और स्कूल में भी डर के मारे स्कूल के पीछे पीपल के पेड़ के नीचे बैठ मंत्रणा चल रही क्या करे जिससे दोनों मार से बचा जा सके, इतने में एक आवाज आई ‘क्यों राकेश यहाँ क्या कर रहे हो, आज स्कूल नहीं गए’ फिर क्या था रोना चालू सारी घटना रो- रो के सुनाई अच्छा ये बात है, तुम बताओ ये सही बोल रहा है, घर जा के पूछूंगा गलत निकली तो समझ लेने, ‘चलो चोरों कान पकड़ो उठ बैठ लगाओ बोलो येँसी गलती दुवारा नहीं होगी’ और स्कूल ले कर गए, शिक्षक से बात की और हमें प्रवेश दिलाया। ये आदमी हमारा कोई नातेदार रिश्तेदार नहीं था मेरे पड़ोस में रहने वाला वह व्यक्ति जिसको हम प्यार से ‘साहब भैया’ कहते थे उनका नाम है श्री बसंत चौधरी.

यहाँ साहब भैया का रोल एक समाज के जिम्मेदार नागरिक का था जिसने अपनी भूमिका निभाई और हम सबके मन में गलत काम करोगे तो पकड़े जाओगे, समाज का दबाव, बड़ों के प्रति सम्मान हमेशा के लिए बैठा दिया। अर्थात परिवार को समाज का हस्तक्षेप और समाज को सारे परिवारों को अपना संरक्षण देना होगा।

परंतु इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता की जिन संस्था को हम अपने बच्चों को शिक्षा, दीक्षा और उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी चाहे सामाजिक स्तर पर न हो,परंतु व्यावसायिक स्तर पर तो  सौंप रहे हैं, तो उनको इसे स्वीकारना होगा और वे दंड के भागीदार भी हैं।यह नीतिगत बिषय है और निजीकरण करने के पहले सरकार को पहले नियम कानून बनाकर उन्हें सार्वजनिक करना चाहिए जिससे संस्था, सरकार और उपभोगता के अधिकार, कर्तव्यों से सभी अवगत हों और उन्हें लागू कराने के लिए एक जुट प्रयास किए जाएँ।

हम आज ‘ना निगलते बने, ना उगलते बने’ की स्थिति में हैं यदि प्राइवेट में ना भेजें तो सरकारी स्कूल हैं नहीं, हमारी मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है, हम जानबूझ कर इस रास्ते पर चलने के लिए मजबूर हैं। इसके 2 ही हल हैं या तो सरकार सारे स्कूल को अपने अधिकार में ले जो सरकार को प्रशासनिक, आर्थिक संकट स्वीकारने नहीं देगा, दूसरा हम खुद बहिष्कार कर दें तो फिर घर पर बच्चों की शिक्षा, दीक्षा, सुरक्षा के लिए “माँ” का होना आवश्यक है जो आज बहुत मुश्किल है, परंतु यदि मात्र दो बर्ष इस आंदोनल को चला दिया जाए तो, ये शिक्षा की दूकान, विध्यालय में बदल जाएंगी या सरकार को गंभीरता से इस बिषय पर सोचना होगा। यदि आपके पास कोई और सार्थक मध्यम मार्ग हो तो अवश्य लिखें ।

अंत में पुन: आप से निवेदन करूंगा समाज के इस बदलते परिवेश में हम सब को हर बच्चे का माँ-पिता बनना होगा और श्री बसंत चौधरी जैसे आँख कान खोल कर रखना होगा कि कहीं कोई बच्चा किसी समस्या मैं तो नहीं उसको हमारी जरूरत तो नहीं साथ ही साथ परिवार को भी इन ‘साहब भैया’ को प्यार और प्रतारणा का अधिकार देना होगा।

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  1. Amazing article !
    I sincerely believe that privatization should be stopped to some sectors (education specially) so as to reduce the ever growing education cost as well as to stop their stubborn willfulness, privatization is making education a business.
    Therefore when Govt will put its efforts towards this then many of money and fame making business will discontinue.

  2. समाज से साहब भैया बसंत चौधरी जी गायब हो गए हैं।शिक्षा व्यवस्था ढह चुकी है।अब आगे बढ़ना और पीछें लौटने से भी समस्याओं का सामना ही करना है।

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