कड़कड़ाती ठंड की वो सुबह..
चाय की ट्परी पर कोलाहल करती कुछ टोलियाँ
चुस्किया लेता हुआ एक तरफ झुंड..
और कोने में अकेला बैठा, सबको तकता ‘वो’.

सूट बूट पहने ..फिर भी कंपकँपाते वे लोग
फटे कंबल का-सा बुना जॅकेट डाले, उघड़ी छाती से भी मुस्कुराता ‘वो’

मैली सी खाली कोई झोली उठाए चल पड़ा नंगे पाव
झूमता गाता ..मस्त मौला सा
कभी कुछ कहता ..कभी कुछ पूछता..और कभी हाथ जोड़ते आगे बढ़ता दिखता.
लगा की कुछ माँग रहा होगा,
सुनना चाहा मैने पर
कुछ सर्द मौसम ने, और मन के कुछ निरूत्साह ने उठने ने दिया,
पर मैं सोचता रहा..उसको देखता रहा
शायद चाय माँगता होगा ?! या डबल रोटी.
पर इस झुंड के पास क्यू ना रुका..?
युवाओ की मंडली वो..दो टुकड़े तो यूही दे देती डींग हांकने को.

वो बढ़ता हुआ ..जा बैठा अध्बुझि अंगीठी के पास
झोली खोली, टटोलते हुए कुछ ..
रोटी का कोई टुकड़ा सा निकाला..
दो मे तोड़ा और बाँट खाया ताकते भटकते मासूम एक कुत्ते के साथ!!

भौचक्का मैं , देखता रह गया एक टक्क
अपने हाथ के चाय के गरम प्याले, बदन के नीचे नरम मेज़..
और बरबस, अक्सर आते अपने अहम को.

लाचारी उसकी हालत मे नही मेरी नज़ारो में थी,
चमक मेरे कपड़ो मे नही उसकी आँखो मे थी.

अंततः मेरे मन का कोतुहल और उसके आँखो की चमक
ले गयी मुझे खीच उसके पास..
और पूछ बैठा उससे व्याकुल मन

की क्या है ‘ज़िंदगी’..?

तेरी दरिद्रता मे भी संपूर्ण तृप्ति है,
और मेरी संपूर्णता में भी जीवन से विरक्ति
मेरे जीवन मे धन धान्या की कमी नही
पर फिर भी तेरी उन आँखो की चमक का प्रलोभन है!

जान मेरी उत्सुकता को हंस पड़ा ज़ोर से वो..
और बोला तूने जो चाहा वो या तो पा लिया
या खो दिया..
खोए को तू रोता है और पाए के अधूरेपन का अफ़सोस मनाता है.

और मैने कुछ चाहा ही नही.. इसलिए जो पाता हूँ उसमे खुश हो जाता हूँ.
आज की रोटी ख़ाता हूँ कल की परवाह किए बगैर सो जाता हूँ.

…कहता हुआ, फिर मुस्कुराता आगे चल दिया.
..और में यूँही निहस्तब्ध सा खड़ा कभी खुद को कभी उसको देखता भर रह गया.