व्यथा -2

सरकार क्या कर रही है ? बड़ा ही ज्वलंत प्रश्न है, चाहे वह भ्रष्टाचार, चोरी, नौकरी की कमी या फिर शिक्षित बेरोजगारों का प्रश्न आदि आदि …………

दोस्तों अपनी बात एक छोटे से उद्धरण से प्रारम्भ करता हूँ, मैं कल ही सिटी बस से यात्रा कर रहा था, कंडक्टर द्वारा टिकिट के लिए 12/- रुपए मांगे गए बंदे ने 10/- दिये और निगाहों में बोला रख लो, परंतु जब बस घाटे के कारण बंद होगी तब हम कहेंगे सरकार कर क्या रही है। ऐसे कई उदाहरण हमारे आस पास मिल जाएंगे। हमने कालांतर में अपनी छोटी सोच,कामचोरी,नेतागिरी की दम पर अपने सरकारी दायित्वों से मुँह मोड़ा और सरकार या यूं कहें की अधिकारियों ने धीरे धीरे श्रम संबंधी कार्यों को प्राइवेट से कराने चालू कर दिये जिससे सरकार को लाभ हुआ और आज वे एक आवश्यकता बन गई और हम सरकारी कर्मचारी आराम की नौकरी करके खुश हुए, जिसका दुष्परिणाम सरकारी नौकरियों में कमी के रूप में आज हमारे सामने है।कर्मचारियों पर अत्याचार न हो और पार्टियो का कर्मचारी से सीधा संवाद हो सके इसलिए यूनियन बनाई गई जो कालांतर में भस्मासुर सिद्ध हुई। सरकार और कंपनियों ने हमारा दुरुपयोग किया और हमें व हमारी आने वाली जनरेशन को सरकारी नौकरियों से वंचित कर दिया। सरकार को प्राइवेट कंपनी और NGO से काम कराने का मौका मिला जिससे  कम पैसे में अपने टार्गेट पूरे करने का लाभ मिला उसे वे चुनाव के समय अपनी उपलब्धि के रूप में प्रदर्शित कर सके। कुल मिलकर हमारी ही कमजोरियों ने आउट सोर्स (out source)को जन्म दिया और हम समझ भी नहीं पाये।

आज सरकार केंद्रीय उच्चशिक्षा को भी स्वायत्तता की तरफ ले जा रही है क्योंकि कमोबेश वहाँ भी यही कारण हैं, शिक्षक शिक्षण संस्था में आते ही नहीं और आते भी हैं तो क्लास नहीं लेते यदि कोई छात्र या समूह बात उठाता है तो उसे अपने परिणाम में इसका प्रभाव देखने को मिलता है। सरकारी शिक्षण संस्थानों /कॉलेज में प्रयोगशाला,क्लास रूम, भवन की हालत बहुत खराब है, शिक्षा का स्तर इतना गिरा हुआ है कि तकनीकी संस्थानों के बच्चे गाइड से पढ़ कर डिग्री कर रहे हैं, इतिहास गवाह है कि आज तक हिंदुस्तान कि कोई भी संस्था ने एक भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर का छात्र इस देश को नहीं दिया, कोई भी खोज अपने नाम पर नहीं दर्ज करा पाये तब इस स्थिति में सरकार के पास क्या हल है।

यदि सरकारी संस्थानों का सर्वे कराया जाए तो पाएंगे कि वहाँ का अधिकतर स्टाफ अपने स्वयं के धंधे में लगा है या नेतागिरी कर रहा है सरकारी कामकाज पेंडिग पड़ा है, तो फिर सरकार या अधिकारी वर्ग अपने मुख्य कार्य प्राइवेट वेंडर से करा रहे हैं। सरकार ने समय कि पाबन्दी के लिए उपकरण (bio matric attendance system) लगाए परंतु वे आज तक सारे केंद्रीय/स्टेट के कार्यालयों में लागू नहीं हो पाया क्यों? क्योंकि हम खुद नहीं चाहते कि लागू हो क्यों कि हमारे अंदर  मक्कारी,आलसीपन,भ्रष्टाचार इतना व्याप्त है की हम देश समाज हित की कोई भी योजना को व्यक्तिगत लाभ से जोड़ कर देखते हैं।इन परिस्थिति में सरकार अपने काम प्राइवेट में करके अपनी पीठ थपथपा लेती है, अधिकारी अपना लाभ ले लेते है फिर खाली पड़े पदों की किसको चिंता और क्यों भरें।

समय आ गया है की हम अपनी योग्यता अपने काम में दिखाएँ और जितना हो सके कम से कम काम को अपने हाथ से निकलने दें नहीं तो आने वाले समय में सरकारी नौकरी दूर की कौड़ी होगी।सबसे अच्छा होगा नव युवक अपने स्वयं के उद्योग स्थापित करें, जहां वे अपनी मेहनत और ईमानदारी से अपना और देश का भाग्य बनाएँ। पूंजी का अभाव एक बड़ा कारण है इसके लिए समूह में कार्य करें जिससे जोखिम भी बंट जाएगा और हिम्मत भी मिलेगी।मेंने अपने पूर्व के लेख “व्यथा” में लिखा था कि आर्थिक विकास के लिए शिक्षा और समाज का योगदान नगण्य है क्योकि उसके लिए मेहनत और लगन चाहिए, अत: स्वयं अपनी योग्यता के आधार पर अपनी उच्च शिक्षा का चयन करें क्योकि हर बच्चा डाक्टर या इंजीनियर नहीं बन सकता इसलिए ऐसी शिक्षा ले जो आपको आगे जा कर आपके उद्योग में सहायता करे । समाज को भी सुरक्षा के खोल को तोड़ना होगा तभी नवजीवन निकलेगा। नवयुवकों को  सुरक्षा और मार्गदर्शन देना होगा।समाज को अपनी सोच में परिवर्तन करना होगा शादी जैसे बड़े बड़े आयोजनों में हो रहे खर्च को बच्चों के उद्योग में लगाना होगा बच्चों के मिलान में भी उनके व्यवसाय में जीवन साथी का सहयोग हो सोच बनानी होगी और इस प्रकार हम एक नए हिंदुस्तान का निर्माण करेंगे।

कुल मिलाकर अब हमें “सरकार क्या कर रही है” ? से हट कर हम क्या कर सकते है पर सोचना होगा,क्योंकि हम 70 वर्षों से देखते आ रहे है कि सरकारें विकास तो करती हैं और करती रहेंगी क्योंकि बिना विकास के हम यहाँ तक नहीं पहुँचते, परंतु उनका विकास का एजेंडा आम आदमी से इतर होता हैं नहीं तो आज हमारे बढ़ई ट्रेक्टर सुधारते होते और कुम्हारों के बर्तन के कारखाने होते परंतु वहाँ भौगोलिक और सामाजिक परिवेश का मूल्यांकन नहीं होता,इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं कि हम काबिल हैं,हममें कोई कमी नहीं है, जब हम विदेश में जाकर डंका बजा सकते हैं तो देश में क्या नहीं कर सकते। सिर्फ हमें नवयुवकों को सामाजिक बल और मूलभूत संसाधन भर उपलब्ध कराना होगा। वे हमें एक नया सुंदर भारत अवश्य देंगे।