“व्यथा”

आज न जाने क्यों आम आदमी व्यथित और छुब्ध है, कोई पारिवारिक, कोई सामाजिक कोई राजनैतिक कारणों को दोषी मान रहा है। समीक्षाएं तो होती रही हैं, और होती रहेंगी, परंतु वे समीक्षा विशेष समालोचकों द्वारा समय समय पर होती थीं और वो एक अनुसंधान का विषय होती हैं, जन मानस का उनसे सीधा संबंध नहीं होता है । आज सोशल मीडिया के सहज सुलभ उपयोग से ये समीक्षा जन मानस को विचलित कर रही हैं

सोशल मीडिया पर आज कल मानव,सामाजिक,सांस्कृतिक मूल्यों पर गंभीर बहस छिड़ी हुई है, परंतु प्रयास नगण्य हैं, क्योंकि इसकी नींव तो हमने ही डाली है, व्यक्तिगत विकास की सीढ़ी चढ़ते चढ़ते हम अपने मूल्यों(पारिवारिक,सामाजिक,सांस्कृतिक) को पीछे छोडते गए और इस आपाधापी में व्यक्तिगत विकास तो हुआ परंतु व्यक्तित्व  बौना हो गया।

सभ्यता, संस्कृति और विकास को यदि हम इतिहास के पन्नों में खंगालें तो पाएंगे कि ये तीनों एक दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि सभ्यता शब्द का प्रयोग समाज के सकारात्मक, प्रगतिशील विकास को दर्शाएगा, वहीं संस्कृति को सभ्यता का पर्याय माना गया है, जो अपने व्यवहार,चालचलन,खानपान,रहनसहन से प्रभावी समाज बनाता है। इस विकास में हमने प्रकृति और पर्यावरण को अपना आदर्श माना है।

इसके इतर यदि आधुनिक युग पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि विकास सिर्फ और सिर्फ आर्थिक आधार बन कर रह गया, जो सभ्यता और संस्कृति का पोषण नहीं करता, वह व्यक्तिगत है जो समाज में प्रतियोगिता लाता है और वही विकास का मूल भी है। व्यक्तिगत विकास में शिक्षा और समाज का योगदान नगण्य है, वह एक व्यक्ति की सतत मेहनत और लगन का परिणाम है, अनेकों उदाहरण से समझा जा सकता है जैसे न्यूटन, गॅलिलिओ,अंबानी आदि।

यदि भारत के पुराने इतिहास पर निगाहें दौड़ाएँ तो पाएंगे कि यहाँ पर विकास कि गति धीमी थी, परंतु वह संस्कृति और सभ्यता  को साथ लेकर चल रही थी, जिसमें “वसुधेवकुटुंबकम” की भावना थी, यहाँ लोग परस्पर हिलमिल कर रहते थे सुख दुख बांटते थे, जैसे ही हम दुनिया की दौड में शामिल हुए हम भी व्यक्तिगत विकास की ओर मुड गए जो आज हमारी व्यथा का कारण बन गया और मानवता,संवेदना,सहष्णुता,भाईचारा जैसे शब्द अपना अस्तित्व खोज रहे हैं। विकसित देश आज सुख समृद्धि का उपभोग तो कर रहे हैं परंतु वहाँ सामाजिक मूल्य,सुख शांति नहीं है। अत: यदि समग्र विकास करना है तो सभ्यता संस्कृति को साथ लेकर चलना होगा और प्रकृति का दोहन नहीं पोषण करना होगा।

दोस्तों, यह यात्रा हमारे घर से ही शुरू होगी जहां हम बच्चों को अपने कर्मों के द्वारा यह समझाएँ कि शिक्षा और उच्च शिक्षा इस प्रकार हो जो तुम्हें अपने भविष्य निर्धारण के साथ साथ समाज और देश के हित में हो। इसके लिए शिक्षा नीति में भी आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है, जो बच्चों में योग्यता और क्षमता के आधार पर ऐसे भविष्य के निर्माण में सहायक हो जो देश और समाज का भी भला करे।

अस्तु, हमने जो अपने आस पास परिवेश निर्मित किया है उसमें सुधार करना होगा चाहे वह पारिवारिक,सामाजिक या राजनीतिक हो, स्वयं से इतर देश हित में समग्र विकास करके ही हम अपने मूल्यों को बचा पाएंगे ।