8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस
आज पूरी दुनिया महिलाओं की उपलब्धियां, उनके योगदान और उनके महत्व की ही बातें करेगी | आज के दिन दुनिया भर के लोग हैप्पी वूमंस डे बोलकर बधाई देंगेे, सम्मान करेंगे | हमें हमारा महत्व समझाएंगे | सोशल मीडिया पर सिर्फ और सिर्फ महिलाओं की ही बातें होंगी और कल ????
कल सब भूल जाएंगे | फिर वही घरेलू हिंसा, दहेज, बलात्कार, बाल विवाह जैसी खबरें हमें सुनने मिलेगी तो आखिर क्या खास है आज? ऐसी कौन सी खुशी की बात है जो हम हैप्पी वूमंस डे की पोस्ट किए जा रहे हैं | 8 मार्च को तो सबने जैसे स्पेशल ही बना दिया है या यु कहे की एक दिन औरतों के नाम कर दिया | 19 नवंबर को इंटरनेशनल मैन्स डे (पुरूष दिवस) होता है | पर क्या उस दिन पुरुषों को भी उतना ही महत्व दिया जाता है?? नहीं ना ! क्यों ? क्योंकि उसकी जरूरत ही नहीं है | मै दावे से कह सकती हूं कि काफी पुरुषो को पता भी नहीं होगा कि पुरुष दिवस भी होता है | हमारा समाज पुरुषसत्ता धारी है | स्त्रियों को उनका महत्व याद दिलाने के लिए एक दिन बनाया गया है, बचे हुए शेष दिनों में पुरुष का महत्व हम बखुभी समझते हैं | हमने तो खुद अपने आप को समाज से अलग कर लिया है | अपनी अलग पहचान बना ली है | सदियों से खुद को अलग हिस्से में रखा है | अपने खुद के काम बांट लिए हैं | पर कोई बात नहीं यह तो सदियों से चला आ रहा है हमने क्या खास किया ?

बेटा पैदा हो तो नीले रंग के कपड़े और बेटी पैदा हो तो गुलाबी रंग के कपड़े ऐसी बातें करने वाली नई पीढ़ी खुद हैं फिर क्या लड़का – लड़की की बराबरी की बातें करती हैं |
बेटियों को तो हम खुद ही बचपन से सिखाते हैं दूसरे घर जाना है , ससुराल की जिम्मेदारी उठानी है रसोई का काम तो आना ही चाहिए फिर भले ही हम बाहर जाकर नौकरी क्यों ना करती हो लेकिन फिर भी रसोई तो हमे ही संभालनी है |
यदि घर में कोई मेहमान आए हो तो मां हमेशा मदद के लिए बेटी को ही आवाज देगी बेटे को नहीं क्यों ? क्योंकि ऐसी हमारी मानसिकता बन चुकी है | जब तक बेटी की शादी नहीं होती हैं तो मायके वाले कहते हैं बेटी तो पराई है | शादी करके ससुराल चली जाए तो वहां कहते हैं ये तो दूसरे घर से आई है | औरत का खुद का कोई अस्तित्व भी नहीं है ना खुद का कोई घर है | अगर घर में औरत ही ना हो तो क्या वह घर, घर लगेगा ?
मेरे हिसाब से भगवान ने इंसानों को दो ही वर्गों में बांटा है एक पुरुष और एक स्त्री |
परंतु शायद दोनों को समान महत्व देना भूल गया | घर, परिवार, समाज के कुछ काम औरतों के जिम्मे और कुछ पुरुषो में बाँट दिये है | ऐसा क्यों ?
स्त्रियों की पहचान पहले अपने पिता से फिर अपने पति से | उनकी खुद की तो कोई पहचान भी नहीं है | अगर बेटे की शादी हो तो मां मंडप में नहीं जा सकती, ऐसा क्यों ? वही तो है जो उसे दुनिया में लाई है | क्यों चिता को मुखाग्नि देने का अधिकार हमें नहीं है? पर क्या कर सकते हैं, हम खुद भी ऐसे जीवन जीने के आदी हो गए हैं | जो खुद को ही मान नही दे सकता तो दूसरे उसे क्या मान देंगे? इसलिए स्त्रियों को पहले खुद का महत्व समझना होगा सिर्फ किसी एक दिन अपने खास होने का क्या उत्सव मनाना? हम हैं खास तो रोज ही उत्सव होना चाहिए | एक औरत क्या हासिल कर सकती हैं, इसकी कोई सीमा नहीं है | वह हर क्षेत्र में शक्तिशाली हैं और सबसे बेहतर है| सिर्फ़ दायरो सीमित ना रहे, अपने आप को पहचाने | अपना महत्व समझें, यह आपका पूरा हक है |